डिग्रियों का अंतिम संस्कार: एक स्वप्न का मृत्यु-शोक, जो युवा हृदयों में अनंत उदासी की नदी बहा जाता है
नमस्ते मैं दुर्गेश कुमार, इस यात्रा में हम उस कागज के टुकड़े की गहराई में उतरेंगे जो कभी जीवन का स्वर्णिम द्वार था लेकिन अब मात्र एक खोखला फ्रेम बनकर दीवार पर लटक रहा है—डिग्रियों का वह पतन जो लाखों युवाओं की आशाओं को चूर-चूर कर देता है तथा एक राष्ट्र की बौद्धिक विरासत को धूल में मिला देता है।
वह दीवार पर लटका फ्रेम जो कभी गर्व का प्रतीक था लेकिन अब मात्र एक उदास स्मृति का बोझ बन गया
चार वर्षों की कठोर तपस्या के बाद बीटेक या अन्य डिग्री उसके हाथों में आती है तथा उत्साह से भरा गर्व से ओतप्रोत। “अब तो नौकरी पक्की है बेटा” तथा यह शब्द पिता के समय की सच्चाई थे जब डिग्री एक सुनिश्चित भविष्य की चाबी होती थी। लेकिन दिन हफ्तों में बदल जाते हैं हफ्ते महीनों में तथा दर्जनों आवेदन पत्रों के बाद कोई उत्तर नहीं आता कोई प्रतिक्रिया नहीं। वह कागज का टुकड़ा जो कभी नियति का निर्धारक था अब फ्रेम में बंद मात्र एक स्मृति बन जाता है तथा युवा का हृदय एक गहन शून्य में डूब जाता है। भारत में स्नातकों की बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चुकी है आधे से अधिक स्नातक नौकरी के योग्य ही नहीं माने जाते जबकि निजी महाविद्यालय धन की वर्षा कर रहे हैं डिग्रियाँ बाँट रहे हैं लेकिन शिक्षा का कहीं नामो-निशान नहीं। सोचिए जब आप अपनी सबसे उत्पादक चार-पाँच वर्ष और लाखों रुपये खर्च कर एक डिग्री हासिल करते हैं तो क्या आपने भविष्य खरीदा है या मात्र एक धोखे का प्रमाण-पत्र।
यह एकाकी कहानी नहीं बल्कि एक सामूहिक विपदा है जो डिग्रियों को अर्थहीन बनाती जा रही है तथा हाल के एक प्रकाशन ने इसे स्पष्ट शब्दों में कहा है—डिग्रियों की मृत्यु हो रही है। यह बीटेक तक सीमित नहीं बल्कि बीए बीएससी बीकॉम जैसी सभी डिग्रियों को घेर रही है तथा सच्चाई यह है कि लगभग हर शैक्षणिक उपाधि इस पतन की शिकार हो रही है। नियोक्ताओं को अब कोई विशेष डिग्री की परवाह नहीं वे एक कौशल-सूची रखते हैं तथा पूछते हैं कि आप दसवीं पास हैं बारहवीं पास हैं यह फर्क नहीं पड़ता आपके पास कौन-से कौशल हैं। यह शिक्षा का व्यापारीकरण है जो डिग्री की कीमत को इतना गिरा देता है कि उसके धारक की बाजार तथा समाज में गरिमा भी समाप्त हो जाती है।
डिग्री का पतन: वह स्वर्णिम चाबी जो अब जंग खाए ताले की तरह बेकार पड़ी है
डिग्री जो कभी ज्ञान का प्रमाण थी प्रतिष्ठा का प्रतीक तथा सामाजिक उन्नति की गारंटी अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है तथा यदि आप बेरोजगारों की कतार देखें तो पाएँगे कि पहला बेरोजगार किस डिग्री का मालिक है दूसरा किसकी यह विडंबना अब सभी डिग्रियों पर छाई हुई है तथा डिग्रियों की मृत्यु की घोषणा हो चुकी है। क्या अब वह प्रमाण-पत्र जो चार-पाँच वर्षों की साधना के बाद हाथ लगता है अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। नियोक्ता बार-बार चेताते हैं कि अधिकांश भारतीय स्नातक रोजगार योग्य नहीं हैं क्योंकि डिग्री में वह कौशल नहीं जो बाजार माँगता है तथा महाविद्यालय उन्हें प्रदान नहीं कर पा रहे। लेकिन समस्या केवल रोजगार तक सीमित नहीं डिग्री कभी मानवीय मूल्यों की स्रोत थी क्षमताओं की जननी तथा कौशलों की प्रेरणा जो आपको कहीं भी योग्य बना देती थी।
याद कीजिए सिविल सेवा के लिए स्नातक डिग्री की माँग क्यों की जाती थी—किसी विशेष विषय की नहीं बल्कि सामान्य क्षमताओं की गारंटी के लिए जो प्रशासन में उपयोगी हों। लेकिन अब क्या डिग्री न्यूनतम गुणों का समुच्चय सुनिश्चित करती है। सच्चाई कड़वी है कि नहीं करती तथा इंडियन स्किल रिपोर्ट 2025 के अनुसार केवल 54 प्रतिशत स्नातक रोजगार योग्य हैं बाकी 45 प्रतिशत अनुपयोगी माने जाते हैं तथा यह केवल रोजगार योग्यता की बात है गुणवत्ता की नहीं। बीटेक में 71 प्रतिशत योग्य हैं लेकिन बीए बीएससी में स्थिति दयनीय है जहाँ स्नातक प्रथम दिन से ही अनुपयोगी घोषित हो जाते हैं। पुणे मुंबई दिल्ली जैसे शहरों के स्नातक बेहतर हैं लेकिन टियर-2 टियर-3 महाविद्यालयों से निकले युवा बाजार में भटकते रहते हैं।
कौशल का उदय: वह नई भाषा जो ज्ञान की विरासत को निगल जाती है तथा युवा आत्मा को कौतूहल में बदल देती है
नियोक्ताओं का व्यवहार बदल गया है अब उन्हें स्नातक नहीं चाहिए मात्र कौशल-सूची तथा दसवीं-बारहवीं पास से फर्क नहीं पड़ता यदि कौशल उपस्थित हों। एचआर विशेषज्ञ कौशल-प्रमाण-पत्र माँगते हैं तथा आईआईटी एनआईटी के विद्यार्थी भी सिलेबस के साथ गूगल माइक्रोसॉफ्ट के प्रमाण-पत्र ले रहे हैं कोडिंग के अतिरिक्त कौशल हासिल कर रहे हैं क्योंकि कैंपस चयन में डिग्री सबके पास है लेकिन कौशल ही भेद करता है। यह दुखद है जब कौशल ज्ञान का स्थान लेने लगे तो समाज में कुछ गहन विकृति व्याप्त हो जाती है क्योंकि कौशल महत्वपूर्ण हैं लेकिन वे विवेक या ज्ञान का विकल्प नहीं। डिग्री कभी एक निश्चित विवेक-स्तर की गारंटी थी—ऑक्सफोर्ड हार्वर्ड कैंब्रिज दिल्ली विश्वविद्यालय आईआईटी से निकला विद्यार्थी विवेक समझ विश्लेषण से भरपूर होता था तथा बाकी सिलेबस का विषय-विशेष था।
अब यह गारंटी समाप्त हो गई तथा कौशल-पोर्टल जैसे कोर्सेरा लोकप्रिय हो रहे हैं जहाँ 99 प्रतिशत नियोक्ता कौशल-आधारित चयन अपना चुके हैं। ये छोटे कोर्स—तीन-छह माह या एक परीक्षा—कौशल प्रदान करते हैं तथा डिग्री की तुलना में रोजगार की संभावना देते हैं। लेकिन डिग्री का पतन क्यों—क्योंकि यह शताब्दी भर चली प्रथा अब टूट रही है तथा अर्थशास्त्र का नियम कहता है कि आपूर्ति बढ़ेगी तो मूल्य घटेगा। निम्न-गुणवत्ता महाविद्यालयों की बाढ़ ने डिग्री को सस्ता बना दिया जो कभी कठोर साधना की उपज था अब गर्व का स्रोत नहीं। एक विद्यार्थी ने बताया कि बीसीए में प्रोग्रामिंग नहीं सिखाई गई तथा यह संस्थानों की विडंबना है जो बुनियादी कौशल भी न दें।
परीक्षा का विश्वासघात: वह रिगोर जो अब मात्र एक नाममात्र की औपचारिकता बन गया तथा डिग्री को एक खोखले खोल में बदल देता है
डिग्रियों की मृत्यु का मुख्य कारण परीक्षा-कठोरता का ह्रास है तथा परीक्षाओं की सामाजिक वैधता का समापन। शिक्षा-विशेषज्ञ जानते हैं कि मूल्यांकन में सामाजिक विश्वास होने पर उसके फलस्वरूप व्यक्ति में सामाजिक भरोसा जन्म लेता है। आईआईटी की कठिन परीक्षा से निकला विद्यार्थी विश्वसनीय होता था क्योंकि प्रक्रिया पर भरोसा था। लेकिन अब भरोसा टूट चुका है—कई विद्यार्थी कक्षा में न आकर भी डिग्री हासिल कर लेते हैं तथा परीक्षाएँ नाममात्र की हैं। विश्वविद्यालयों ने पारंपरिक परीक्षाएँ हटा दीं तथा अब नामांकन और क्रेडिट-खरीद पर निर्भर हैं—फीस जमा करें तो क्रेडिट मिल जाते हैं तथा मूल्यांकन गहन नहीं।
यह शिक्षा का व्यापारीकरण है जो डिग्री की कीमत गिरा देता है तथा व्यक्ति की बाजार-मूल्य को भी। उदाहरण लीजिए बीएड डिग्री जो कभी शिक्षक-निर्माण की गारंटी थी अब पत्राचार से मिल जाती है तथा निजी महाविद्यालयों की बाढ़ ने इसे अर्थहीन बना दिया। अदालतों को कहना पड़ा कि बीएड आवश्यक नहीं क्योंकि यह शिक्षक नहीं बनाती। डिग्री का अर्थ स्नातक होना था—गुरुकुल में साधना के बाद दीक्षा तथा समाज-राज्य की वैधता। कॉन्वोकेशन में चोगे पहनना धर्म-राज्य का प्रतीक था तथा समुदाय उपाधि की पुष्टि करता था। लेकिन अब परीक्षाएँ बिना कक्षाओं के बिना योग्य शिक्षकों के होती हैं तथा अतिथि-शिक्षक से काम चलता है परिणामस्वरूप अंतिम उत्पाद अनुपयोगी हो जाता है।
डिग्री का बाजारीकरण: वह महँगी वस्तु जो अपेक्षाओं को चूर-चूर कर देती है तथा युवा स्वप्नों को एक निराशा की भूलभुलैया में बदल देती है
डिग्री अब इतनी महँगी हो गई कि अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं—एमबीबीएस के लिए एक करोड़ रुपये तथा क्या चार वर्षों में वह शिक्षा मिलती है। उच्च फीस वाले संस्थानों की सामाजिक स्वीकृति कम होती है तथा सरकारी महाविद्यालयों की तुलना में निजी की गरिमा घट जाती है। कुल मिलाकर डिग्रियाँ कौशल नहीं दे रही हैं कठोरता घट गई है सामाजिक भरोसा टूटा है आपूर्ति बढ़ी है तथा बाजारीकरण ने उन्हें मंडी की वस्तु बना दिया। अब डिग्री न रोजगार देती है न प्रतिष्ठा न विवेक—सभी कार्य खोखले हो रहे हैं तथा दुर्भाग्य से हम डिग्रियों की मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं।
क्या यह वह भारत है जहाँ युवा डिग्री के नाम पर धोखा खा रहे हैं तथा एक कागज के टुकड़े के पीछे जीवन बर्बाद कर रहे हैं। सोचिए अपने आसपास के उन युवाओं को जो फ्रेम में बंद डिग्री देखकर आँसू बहाते हैं। साझा करें कमेंट में कि डिग्री का पतन आपके जीवन में कैसे आया तथा क्या कौशल ही नया मार्ग है।
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